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Author Topic: Khubsurat HINDI Kavitayen!!  (Read 55854 times)
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If u Dont have ENMY , U dont Have ATTITUDE!

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« on: April 11, 2006, 06:01:44 PM »
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सब कुछ कह लेने के बाद

सब कुछ कह लेने के बाद
कुछ ऐसा है जो रह जाता है,
तुम उसको मत वाणी देना ।

वह छाया है मेरे पावन विश्वासों की,
वह पूँजी है मेरे गूँगे अभ्यासों की,
वह सारी रचना का क्रम है,
वह जीवन का संचित श्रम है,
बस उतना ही मैं हूँ,
बस उतना ही मेरा आश्रय है,
तुम उसको मत वाणी देना ।

वह पीड़ा है जो हमको, तुमको, सबको अपनाती है,
सच्चाई है-अनजानों का भी हाथ पकड़ चलना सिखलाती है,
वह यति है-हर गति को नया जन्म देती है,
आस्था है-रेती में भी नौका खेती है,
वह टूटे मन का सामर्थ है,
वह भटकी आत्मा का अर्थ है,
तुम उसको मत वाणी देना ।

वह मुझसे या मेरे युग से भी ऊपर है,
वह भावी मानव की थाती है, भू पर है,
बर्बरता में भी देवत्व की कड़ी है वह,
इसीलिए ध्वंस और नाश से बड़ी है वह,

अन्तराल है वह-नया सूर्य उगा लेती है,
नये लोक, नयी सृष्टि, नये स्वप्न देती है,
वह मेरी कृति है
पर मैं उसकी अनुकृति हूँ,
तुम उसको मत वाणी देना ।
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ZINDGI Zinda Dili ka Naam hai, MURDA Dil Bhi Kya Khakh Jiya Karte Hain!!!!!

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« Reply #1 on: April 11, 2006, 06:03:15 PM »
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bachapna

Aasamaana me Aaja andhera dekha
saao gayaa kahan mera bachapna deKha
Aaj SarIr ko kuCh thakte deKha
Aaj fir Apne Aap ko marte deKha

bachapna ke kya din the yaar
Khelate the kUdte the udate the gaulaal
divaalI per paTaKe uData the hajaar
Aaur kitnaa majaa udate the yaar

Khelate the kUdte the  to ladte bhi the yaar
Par hum hameSaa hum kisI se JhagaDte to na the
class me jaate the to padhate BhI the
hum hameSaa Sharart karte na the

janma din pe Khate the bahut saarI mithai
Aate the saathi Aaur dete the badhai
dil de raha hai mera ro–ro ke Aaj duhai
kahan gayaa mera bachapna Aaj uski yaad hai Aai

TU EK BOOND

kabhI barsaI baadal se
kaBhI jharno se
to kaBhI uchali  saagar kI lahraon  se
banake ek boond.

sirf ek boond sirf- ek boond
tU ek boond sirf- ek boond hI hai
Aankhon se nikalane ko sirf- majabUr hI hai.

dard me Tapknaa Aaur KhuShI me Chalknaa
hal dil ka batanaa Aaur naa Shor machaanaa
dil ka dird- batanaa KhuShI ka hal samaJhaanaa
yahI hai kam tera boond bas AanKh se nikalanaa
Aaur bahte hI jaanaa ..
« Last Edit: April 11, 2006, 06:25:04 PM by Alok Sharma » Logged

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Dhaval
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« Reply #2 on: April 11, 2006, 06:04:03 PM »
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awesome poems man

liked it very much
share more if u have  Afro Afro

keep posting Smiley
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« Reply #3 on: April 11, 2006, 06:26:01 PM »
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hey dhaval

thanks

find here some more

आह ! वेदना मिली विदाई

आह ! वेदना मिली विदाई
मैंने भ्रमवश जीवन संचित,
मधुकरियों की भीख लुटाई

छलछल थे संध्या के श्रमकण
आँसू-से गिरते थे प्रतिक्षण
मेरी यात्रा पर लेती थी
नीरवता अनंत अँगड़ाई

श्रमित स्वप्न की मधुमाया में
गहन-विपिन की तरु छाया में
पथिक उनींदी श्रुति में किसने
यह विहाग की तान उठाई

लगी सतृष्ण दीठ थी सबकी
रही बचाए फिरती कब की
मेरी आशा आह ! बावली
तूने खो दी सकल कमाई

चढ़कर मेरे जीवन-रथ पर
प्रलय चल रहा अपने पथ पर
मैंने निज दुर्बल पद-बल पर
उससे हारी-होड़ लगाई

लौटा लो यह अपनी थाती
मेरी करुणा हा-हा खाती
विश्व ! न सँभलेगी यह मुझसे
इसने मन की लाज गँवाई


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« Reply #4 on: April 11, 2006, 06:26:45 PM »
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चाँदनी जी लो

शरद चाँदनी बरसी
अँजुरी भर कर पी लो

ऊँघ रहे हैं तारे
सिहरी सरसी
ओ प्रिय कुमुद ताकते
अनझिप क्षण में
तुम भी जी लो ।

सींच रही है ओस
हमारे गाने
घने कुहासे में
झिपते
चेहरे पहचाने

खम्भों पर बत्तियाँ
खड़ी हैं सीठी
ठिठक गये हैं मानों
पल-छिन
आने-जाने

उठी ललक
हिय उमगा
अनकहनी अलसानी
जगी लालसा मीठी,
खड़े रहो ढिंग
गहो हाथ
पाहुन मन-भाने,
ओ प्रिय रहो साथ
भर-भर कर अँजुरी पी लो

बरसी
शरद चाँदनी
मेरा अन्त:स्पन्दन
तुम भी क्षण-क्षण जी लो !


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« Reply #5 on: April 11, 2006, 06:53:52 PM »
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BECHARA ADHYAPAK
kaun janma ke hue praBhu udya hmaare pap.
Adhyaapak ban kar rahe praayaiShchit chupchap..
PraayaiShchit chupchaap Chatra jivana jab payaa.
hui tanik si Bhul guru ka DanDa Khayaa ..
piTnaa jaarI hai Adhyaapak banate banate.
tab guru se piTte the Aab chelon se piTte..

KALYUGI BABU

paDe paDe hI palang per kare chay ka dhyaan .
havan kare cigrate ka hoy Aatma kalyaan ..
hoy Aatma kalyan maut ka maarg- vichaare .
dhuns mUh me paan peek Aangan me maare   ..
kahe 'kaka' kivaray nahI Aadat per kabU .
Sat Sat tumhe praNaam dhanya kaliyug ke baabU ..

MANTRI PUTRA

rasagulle sab Kha liye Aaur mithai cchod.
mummy se kahne lagaa munna naak sikod..
munna naak sikoD shakhta hai laDDU aise.
tumhI batao mummy isko toDU kaise .
“toD liye tere papa ne chaar vidhayak”.
tuJhase laDDU nahI TUTta hai naalaayak ..

LAKHPATI

nichi nichi najar kar chaliye AanK gaDaye.
naa jaane ikis raah me noTe paDa mila jaaye ..
NoTe paDa mil jaaye Khel fir juAa satta .
lag jaaye jo daav baandh noTon ka gatthaa.
kah 'kaka' kivaraya Bhaagya yadi falta jaaye.
kuCh din me hI` laKhpati tU ho jaaye..
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« Reply #6 on: April 11, 2006, 06:56:54 PM »
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आज तुम मेरे लिए हो

प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो ।

मैं जगत के ताप से डरता नहीं अब,
मैं समय के शाप से डरता नहीं अब,
आज कुंतल छाँह मुझपर तुम किए हो
प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो ।

रात मेरी, रात का श्रृंगार मेरा,
आज आधे विश्व से अभिसार मेरा,
तुम मुझे अधिकार अधरों पर दिए हो
प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो।

वह सुरा के रूप से मोहे भला क्या,
वह सुधा के स्वाद से जाए छला क्या,
जो तुम्हारे होंठ का मधु-विष पिए हो
प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो।

मृत-सजीवन था तुम्हारा तो परस ही,
पा गया मैं बाहु का बंधन सरस भी,
मैं अमर अब, मत कहो केवल जिए हो
प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो।
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« Reply #7 on: April 11, 2006, 06:58:13 PM »
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कफन फाड़कर मुर्दा बोला

चमड़ी मिली खुदा के घर से
दमड़ी नहीं समाज दे सका
गजभर भी न वसन ढँकने को
निर्दय उभरी लाज दे सका

मुखड़ा सटक गया घुटनों में
अटक कंठ में प्राण रह गये
सिकुड़ गया तन जैसे मन में
सिकुड़े सब अरमान रह गये

मिली आग लेकिन न भाग्य-सा
जलने को जुट पाया इन्जन
दाँतों के मिस प्रकट हो गया
मेरा कठिन शिशिर का क्रन्दन

किन्तु अचानक लगा कि यह,
संसार बड़ा दिलदार हो गया
जीने पर दुत्कार मिली थी
मरने पर उपकार हो गया

श्वेत माँग-सी विधवा की,
चदरी कोई इन्सान दे गया
और दूसरा बिन माँगे ही
ढेर लकड़ियाँ दान दे गया

वस्त्र मिल गया, ठंड मिट गयी,
धन्य हुआ मानव का चोला
कफन फाड़कर मुर्दा बोला ।

कहते मरे रहीम न लेकिन,
पेट-पीठ मिल एक हो सके
नहीं अश्रु से आज तलक हम,
अमिट क्षुधा का दाग धो सके

खाने को कुछ मिला नहीं सो,
खाने को ग़म मिले हज़ारों
श्री-सम्पन्न नगर ग्रामों में
भूखे-बेदम मिले हज़ारों

दाने-दाने पर पाने वाले
का सुनता नाम लिखा है
किन्तु देखता हूँ इन पर,
ऊँचा से ऊँचा दाम लिखा है

दास मलूका से पूछो क्या,
'सबके दाता राम' लिखा है?
या कि गरीबों की खातिर,
भूखों मरना अन्जाम लिखा है?

किन्तु अचानक लगा कि यह,
संसार बड़ा दिलदार हो गया
जीने पर दुत्कार मिली थी
मरने पर उपकार हो गया ।

जुटा-जुटा कर रेजगारियाँ,
भोज मनाने बन्धु चल पड़े
जहाँ न कल थी बूँद दीखती,
वहाँ उमड़ते सिन्धु चल पड़े

निर्धन के घर हाथ सुखाते,
नहीं किसी का अन्तर डोला
कफन फाड़कर मुर्दा बोला ।

घरवालों से, आस-पास से,
मैंने केवल दो कण माँगा
किन्तु मिला कुछ नहीं और
मैं बे-पानी ही मरा अभागा

जीते-जी तो नल के जल से,
भी अभिषेक किया न किसी ने
रहा अपेक्षित, सदा निरादृत
कुछ भी ध्यान दिया न किसी ने

बाप तरसता रहा कि बेटा,
श्रद्धा से दो घूँट पिला दे
स्नेह-लता जो सूख रही है
ज़रा प्यार से उसे जिला दे

कहाँ श्रवण? युग के दशरथ ने,
एक-एक को मार गिराया
मन-मृग भोला रहा भटकता,
निकली सब कुछ लू की माया

किन्तु अचानक लगा कि यह,
घर-बार बड़ा दिलदार हो गया
जीने पर दुत्कार मिली थी,
मरने पर उपकार हो गया

आश्चर्य वे बेटे देते,
पूर्व-पुरूष को नियमित तर्पण
नमक-तेल रोटी क्या देना,
कर न सके जो आत्म-समर्पण !

जाऊँ कहाँ, न जगह नरक में,
और स्वर्ग के द्वार न खोला !
कफन फाड़कर मुर्दा बोला ।
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« Reply #8 on: April 11, 2006, 07:00:05 PM »
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जल रहे हैं दीप, जलती है जवानी (१)

दीप, जिनमें स्नेहकन ढाले गए हैं
वर्तिकाएँ बट बिसुध बाले गए हैं
वे नहीं जो आँचलों में छिप सिसकते
प्रलय के तूफ़ान में पाले गए हैं

एक दिन निष्ठुर प्रलय को दे चुनौती
हँसी धरती मोतियों के बीज बोती
सिंधु हाहाकार करता भूधरों का गर्व हरता
चेतना का शव चपेटे, सृष्टि धाड़ें मार रोती

एक अंकुर फूटकर बोला कि मैं हारा नहीं हूँ
एक उल्का-पिण्ड हूँ, तारा नहीं हूँ
मृत्यु पर जीवन-विजय उदघोष करता
मैं अमर ललकार हूँ, चारा नहीं हूँ

लाल कोंपल से गयी भर गोद धरती की
कि लौ थी जगमगाई,
लाल दीपों की प्रगति-परम्परा थी मुस्कराई,
गीत, सोहर, लोरियाँ जो भी कहो तुम
गोद कलियों से भरे लोनी-लता झुक झूम गायी
और उस दिन ही किसी मनु ने अमा की चीर छाती
मानवी के स्नेह में बाती डुबायी
जो जली ऐसी कि बुझने की बुझायी-
बुझ गयी, शरमा गयी, नत थरथरायी

और जीवन की बही धारा जलाती दीप सस्वर
आग-पानी पर जली-मचली पिघलने लगे पत्थर

जल उठे घर, जल उठे वन
जल उठे तन, जल उठे मन
जल उठा अम्बर सनातन
जल उठा अंबुधि मगन-मन
और उस दिन चल पड़े थे साथ उन्चासों प्रभंजन
और उस दिन घिर बरसते साथ उन्चासों प्रलय-घन

अंधड़ों में वेग भरते वज्र बरबस टूट पड़ते
धकधकाते धूमकेतों की बिखर जाती चिनगियाँ
रौद्र घन की गड़गड़ाहट कड़कड़ाती थी बिजलियाँ

और शिशु लौ को कहीं साया न था, सम्बल नहीं था
घर न थे, छप्पर न थे, अंचल नहीं था
हर तरफ़ तूफ़ान अन्धड़ के बगूले
सृष्टि नंगी थी अभी बल्कल नहीं था

सनसनाता जब प्रभंजन लौ ध्वजा-सी फरफराती
घनघनाते घन कि दुगुणित वेदना थी मुस्कराती
जब झपेटों से कभी झुक कर स्वयं के चरण छूती
एक लोच कमान की तारीकियों को चीर जाती

बिजलियों से जो कभी झिपती नहीं थी
प्रबल उल्कापात से छिपती नहीं थी
दानवी तम से अकड़ती होड़ लेती
मानवी लौ थी कि जो बुझती नहीं थी
क्योंकि उसको शक्ति धरती से मिली थी
हर कली जिस हवा पानी में खिली थी

सहनशीलता, मूकतम जिसकी अतल गहराइयों में
आह की गोड़ी निगोड़ी खाइयों में
स्नेह का सोता बहा करता निरंतर
बीज धँसता ही चला जाता जहाँ जड़ मूल बनकर
गोद में जिसके पला करता विधाता विवश बनकर

धात्री है वह सृजन के पंथ से हटती नहीं है
व्यर्थ के शिकवे प्रलय-संहार के रटती नहीं है
जानती है वह कि मिट्टी तो कभी मिटती नहीं है
आग उसकी ही निरंतर हर हृदय में जल रही है

स्वर्ण दीपों की सजीव परम्परा-सी चल रही है
हर अमा में, हर ग्रहन की ध्वंसपूर्ण विभीषिका में
एक कसकन, एक धड़कन, बार-बार मचल रही है
बर्फ की छाती पिघलकर गल रही है, ढल रही है

आज भी तूफान आता सरसराता
आज भी ब्रह्माण्ड फटता थरथराता
आज भी भूचाल उठते, क़हर ढहता
आज भी ज्वालामुखी लावा उगलता

एक क्षण लगता की जीत गया अँधेरा
एक क्षण लगता कि हार गया सवेरा
सूर्य, शशि, नक्षत्र, ग्रह-उपग्रह सभी को
ग्रस रहा विकराल तम का घोर घेरा

किंतु चुंबक लौह में फिर पकड़ होती
दो दिलों में, धमनियों में रगड़ होती
वासना की रूई जर्जर बी़च में ही
उसी लौ की एक चिनगी पकड़ लेती

और पौ फटती, छिटक जाता उजाला
लाल हो जाता क्षितिज का वदन काला
देखते सब, अंध कोटर, गहन गह्वर के तले पाताल की मोटी तहों को
एक नन्ही किरण की पैनी अनी ने छेद डाला,
मैं सुनाता हूँ तुम्हें जिसकी कहानी
बात उतनी ही नयी है, हो चुकी जितनी पुरानी
जल रहे हैं दीप, जलती है जवानी
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« Reply #9 on: April 11, 2006, 07:06:08 PM »
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awesome man

m not able to read all poems rightnow
but they r really nice
some karmas to u for this buddy

keep it up  Afro
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